NEET, JEE के बहाने सोनिया गांधी ने की गोलबंदी, बैठक से निकले कई सियासी संदेश

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नई दिल्ली
NEET औक JEE की परीक्षाओं, जीएसटी और कोरोना संकट को लेकर बुधवार को सोनिया गांधी ने गैरएनडीए शासित राज्यों के सीएम के साथ मीटिंग की। विपक्ष जहां गोलबंद होता नजर आया, वहीं यह मीटिंग अहम मुद्दों पर विपक्ष की एक साझी रणनीति के तौर पर भी नजर आई। दरअसल, कोरोना काल में विपक्ष लगभग अलग-थलग सा पड़ा था और अपनी-अपनी लड़ाई लड़ रहा था। लेकिन नीट-जेईई और जीएसटी जैसे मुद्दों पर विपक्ष ने एक साथ आकर कड़े तेवर में केंद्र सरकार को चुनौती दी है। इससे साफ है कि आने वाले दिनों में केंद्र सरकार को तमाम सवालों का सामना करना पड़ेगा।

संसद के आगामी सत्र को देखते हुए विपक्ष की यह गोलबंदी अहम हो उठती है। जिस तरह से मीटिंग में ममता बनर्जी के साथ-साथ उद्धव ठाकरे ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है, उससे साफ है कि विपक्ष शासित राज्य अपने संघीय हकों के केंद्र से आर-पार के मूड में हैं। जाहिर सी बात है कि सोनिया गांधी ने इस मुश्किल समय में विपक्षी दलों को एक साथ केंद्र सरकार के खिलाफ गोलबंद होने का जो मौका दिया है, उससे बिखरे हुए विपक्ष को साथ आने का मौका मिलेगा।

जीएसटी काउंसिल की मीटिंग से एक दिन पहले हुई यह गोलबंदी जीएसटी में अपने हिस्से के मुआवजे को लेकर राज्यों की मांग को न सिर्फ पुरजोर तरीके से उठाने, बल्कि केंद्र पर दबाव डालने में भी कारगर साबित हो सकती है। विपक्ष लगातार केंद्र पर संघीय आवाज को दबाने का आरोप लगा रहा है।

वहीं, कांग्रेस के हालिया घटनाक्रम के बाद सोनिया गांधी यह मीटिंग बेहद अहम हो उठती है। जिस तरह से हाल ही में कांग्रेस के सीनियर नेताओं द्वारा पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर सवालिया निशान लगाए गए, उसे देखते हुए सोनिया की यह सफल मीटिंग कई संकेत देती नजर आई। गैर एनडीए मुख्यमंत्रियों की मीटिंग बुलाकर सोनिया ने साफ कर दिया कि भले ही कांग्रेस अपने कमजोर दौर से गुजर रही है, लेकिन विपक्ष की धुरी आज भी वही बन सकती है। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस की कमजोरी को लेकर बीजेपी की तरफ से तमाम निशाने साधे गए थे।

वहीं अपनी पार्टी में हुई इस उथलपुथल के तुरंत बाद सोनिया ने मीटिंग कर साबित कर दिया कि विपक्ष के बीच उनकी स्वीकार्यता, कद व सम्मान अभी भी कायम है। अपनी नरम सेहत की चर्चाओं के बीच उन्होंने पूरी मीटिंग जिस तरह से संचालित की, उसने साफ कर दिया कि जरूरत पड़ने पर वह भी अभी भी कमान संभालने के लिए तैयार हैं। सोनिया का यह स्वरूप व तेवर पार्टी के भीतर व बाहर दोनों के लिए संकेत था। यह खासकर चिठ्ठी लिखने वाले खेमे को भी एक संकेत था। सोनिया का यह रुख इसलिए भी अहम हो जाता है कि महज दो दिन पहले हुई सीडब्ल्यूसी मीटिंग में उन्होंने अपने संक्षिप्त बयान के अलावा अपनी सारी बात लिखित रूप से रखी थी, जिसे उनकी ओर से पढ़ा गया।

गौरतलब है कि इससे पहले कोराेना काल में लॉकडाउन के दौरान सोनिया ने विपक्षी दलों के साथ कोविड चुनौती व अप्रवासी कामगारों को लेकर एक मीटिंग की, लेकिन उसमें उनकी भूमिका संक्षिप्त दिखी। जिसमें उनकी पार्टी के तमाम बड़े नेताओं ने भाग लिया था।

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