शिवपाल यादव ने इशारों में दी अखिलेश को नसीहत, 2022 चुनाव से पहले समाजवादी एक हों वरना…

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लखनऊ. वैसे तो उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में में विधानसभा के चुनाव 2022 (Assembly Election 2022) में होने हैं, लेकिन उससे पहले सभी विपक्षी दल सरकार को तमाम मुद्दों पर घेरने में जुटे हैं, लेकिन एक बार समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) और यादव परिवार में सुलह की चर्चाएं मीडिया में हैं. एक बार फिर सपा से अलग हुआ शिवपाल यादव (Shivpal Yadav) ने सभी समाजवादियों को एकजुट होने का सन्देश दिया है. अप्रत्यक्ष रूप से चाचा शिवपाल ने भतीजे अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) को कहा है कि समय की मांग यही है कि सभी एक साथ एक मंच पर आ जाएं.

धर्म निरपेक्ष ताकतें एक साथ हों

शिवपाल यादव ने गुरुवार को एक बयान जारी करते हुए कहा, ” मेरी यह व्यक्तिगत आकांक्षा रही है कि समाजवादी धारा के सभी लोग एक मंच पर आएं और एक ऐसा तालमेल बनें जिसमें सभी को सम्मान मिल सके. प्रदेश का विकास हो सके. मैं चाहता हूं कि एक बार फिर 2022 के विधानसभा चुनाव से सभी समाजवादी एक मंच पर दिखें. मेरे लिए यह कोई नई बात नहीं है. मैंने पहले भी कहा था कि अगर हम लोहियावादियों, गांधीवादियों, चरणसिंहवादियों और धर्मनिरपेक्ष ताकतों को एक जगह ला सके तो साम्प्रदायिक शक्तियों को रोक सकते हैं.”

सभी दलों को एक साथ लाने का कर चुका हूं कोशिशशिवपाल यादव जो पिछले दिनों कह चुके हैं कि वह इसके लिए कुछ भी कुर्बान कर सकते हैं, उन्होंने कहा कि, “इस स्वप्न को साकार करने के लिए मैंने 2015 से ही ऐसी ताकतों के महागठबंधन के लिए पहल शुरू कर दी थी. जेडीयू, आरजेडी और रालोद सहित अन्य समाजवादी विचारधारा के नेताओं को लखनऊ में 5 नवम्बर 2016 में हुए समाजवादी पार्टी के रजत जयंती समारोह में भी इसी उद्देश्य से आमंत्रित किया था. हालांकि इस मौके पर किसी गठबंधन की औपचारिक घोषणा नहीं हुई, लेकिन समारोह में मौजूद राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) अध्यक्ष अजित सिंह, जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के वरिष्ठ नेता शरद यादव, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) मुखिया लालू प्रसाद यादव और जनता दल सेक्युलर के प्रमुख एचडी देवेगौड़ा ने एक सुर में नेता जी (मुलायम सिंह यादव) को गठबंधन की कमान देने की बात कही. सामाजिक न्याय में यकीन रखने वाला हर शख्स इस गठबंधन को उम्मीद से देख रहा था. लेकिन दुर्भाग्य से यह संभव न हो सका. आज की परिस्थिति में भी मैं मीडिया के माध्यम से सभी अमन पसंद लोगों की एक जुटता का आह्वान करता हूं.

सपा से गठबंधन पर कही ये बात

शिवपाल यादव ने कहा कि जहां तक समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन का प्रश्न है, उसके लिए मुझे अलग से कुछ कहने की जरूरत नहीं है. समाजवादी पार्टी संघर्ष के दम पर बनी थी, उसमें तीन दशक तक बहुत से समाजवादी विचारधारा के लोगों के साथ मैं भी नेताजी के साथ संघर्ष करता रहा. मुझे उम्मीद है कि आने वाली पीढियां भी संघर्ष का पथ चुनेंगी और जनता के हित को सर्वोपरि स्थान देंगी. एक बात और जो थोड़ी कठोर है और मुझे कहनी चाहिए वो यह कि विपक्ष के लिए यह निर्णायक घडी है. अगर विपक्ष अब भी संघर्ष के लिए तैयार नहीं होता है तो रास्ता बहुत कठिन है.

उन्होंने कहा कि,” अगर ऐसा नहीं हुआ तो जनता की राय के अनुरूप अपनी पार्टी के उम्मीदवारों को मैदान में उतारेंगे. प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) ने सीमित अवधि में शानदार संगठन खड़ा किया है और यूपी की सियासत को प्रभावित किया है. अगर 2019 में हमें विपक्षी दलों के गठबंधन में शामिल किया जाता तो लोकसभा चुनाव के परिणाम कुछ और होते.”

किसी से वैचारिक मतभेद नहीं

शिवपाल यादव ने कहा, “राजनीति में उतार चढाव एक सामान्य परिघटना है. लोहिया कहा करते थे कि राजनीतिक व्यक्तित्व की असल पहचान चुनावों में उसके आचरण से होती है. वैचारिक मतभेद के बावजूद किसी से मेरा मनभेद नहीं रहा. चुनाव में मैंने कभी भी किसी के लिए असंसदीय शब्द का उपयोग नहीं किया. वैश्विक आपदा की वजह से हुए लॉकडाउन से समाज के सभी तबकों को बहुत संकट का सामना करना पड़ा. समाज का कमोबेश हर तबका निराशा का सामना कर रहा है. गरीब भुखमरी का शिकार है. मजदूरों की रोजी-रोटी छिन गई है. किसान, नौजवान की आंखों के आगे अंधेरा हैं. श्रमिक और कारोबारी तंगहाली में आत्महत्याएं कर रहे हैं. निश्चय ही आपदा से उपजा अप्रवासियों का संकट सबसे गंभीर है.

प्रवासी कामगारों पर सरकार की पहल की सराहना

उन्होंने कहा कि अप्रवासियों के सामने आजीविका का संकट है. ऐसे में उनके गावों में ही रोजगार सृजन की आवश्यकता है. मनरेगा के तहत श्रमिकों के लिए कार्यदिवस व दिया जाने वाला दैनिक भत्ता बढ़ाने कि जरूरत है. उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रवासी मजदूरों के हितों को ध्यान में रखकर श्रमिक-कामगार कल्याण आयोग का गठन किया गया है. यह एक सराहनीय पहल है. देश व प्रदेश की नौकरशाही द्वारा इस आपदा से निबटने में उठाए गए कदम अक्षम व अपर्याप्त रहे हैं. साथ ही बेहतर होता कि आपदा प्रबंधन के क्रियान्वयन में नौकरशाही व जनप्रतिनिधियों के समन्वय पर और अधिक जोर दिया जाता. अगर अधिकारी जनप्रतिनिधियों के अनुभव का लाभ उठाते व एक बेहतर समन्वय के साथ कार्य करते तो निश्चय ही आज मजदूर, कामगारों व अन्नदाताओं को इतना अधिक परेशान नहीं होना पड़ता. इस संकट के समय तो ऐसा लगा जैसे जनप्रतिनिधियों को ही क्वारन्टीन कर दिया गया है, उनके समस्त वित्तीय अधिकार सीज कर दिए गए . अगर विधायकों व सांसदों को उनके निधि के एक हिस्से के इस्तेमाल का अवसर दिया जाता तो मदद की पहुंच ज्यादा व्यापक होती.



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