रामविलास पासवान के लाल में लालू कैंप को क्यों दिख रहा ‘चिराग’, एनडीए भी क्यों नहीं कर रहा मान-मनौव्वल

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हाइलाइट्स:

  • तेजस्वी यादव को सत्ता में आने के लिए हर हाल में वोटबैंक की दरकार
  • पप्पू यादव चिराग के सहारे अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश में
  • एनडीए में जेडीयू और बीजेपी के आपसी महत्वाकांक्षा में एलजेपी अपने लिए तलाश रही जगह
  • चिराग नीतीश के खिलाफ लगातार दे रहे बयान

पटना
बिहार विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) के अध्यक्ष चिराग पासवान सुर्खियों में बने हुए हैं। इन दिनों चिराग एक ऐसे नेता के रूप में दिख रहे हैं, जिन्हें लुभाने के लिए उनके सहयोगी से ज्यादा विपक्षी दलों के नेता बयान दे रहे हैं। ताजा मामला श्याम रजक का है। बिहार सरकार में मंत्री श्याम रजक को रविवार को अचानक बर्खास्त कर दिया गया। साथ ही पार्टी से भी निकाल दिया गया। इसके बाद श्याम रजक ने सोमवार को आरजेडी का दामन थाम लिया।

जेडीयू से अलग होने के बाद जब श्याम रजक से चिराग पासवान को लेकर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वे युवा नेता हैं और बिहार को उनकी जरूरत है। वे बिहार के लिए काफी कुछ कर सकते हैं। हालांकि आरजेडी की सदस्यता लेने के बाद श्याम रजक ने ये भी कहा कि बिहार के युवा तेजस्वी यादव से उम्मीद लगाए हुए है।

इससे पहले पप्पू यादव ने चिराग पासवान के साथ गुप्त मीटिंग की। बताया जा रहा है कि इस मीटिंग में बिहार के छोटे दलों को एक मंच पर लाने पर चर्चा हुई। इस मीटिंग में पप्पू यादव ने चिराग पासवान को मुख्यमंत्री पद का दावेदार तक बता दिया।

पप्पू यादव से मुलाकात कर चिराग ने बुलाई LJP की आपात बैठक

इसके अलावा आरजेडी नेता तेजस्वी यादव भी कई बार प्रेस कॉन्फ्रेंस में कह चुके हैं कि अगर चिराग पासवान को सामाजिक न्याय की वास्तविक लड़ाई लड़नी है तो उन्हें महागठबंधन के साथ आना चाहिए। ऐसे में जेहन में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर चिराग पासवान विपक्षी नेताओं को इतना क्यों भा रहे हैं।

आरजेडी को सरकार बनाने के लिए वोट बैंक की जरूरत
आरजेडी मुस्लिम+यादव (MY) समीकरण के दम पर बिहार में 15 साल सरकार में रही। जबकि यह बात पूरी तरह सही नहीं है। इसे समझने के लिए बिहार के 1990 के दौर की राजनीति को याद करना होगा। उस दौर में लालू प्रसाद यादव सामाजिक न्याय की बात करते थे, जिसे तेजस्वी यादव ने दोहराते हुए देखे जा सकते हैं।

लालू के सामाजिक न्याय में केवल मुस्लिम और यादव ही नहीं, बल्कि दलित भी शामिल थे। यही वजह थी कि लालू अक्सर अपनी रैलियों में कहते थे ‘ब्राह्मण खाए हलुआ और हरिजन खाए अलुआ, ई बर्दाश्त करे ललुआ’। लालू यादव के इस एक नारे से समझा जा सकता है कि वे दलित वोटर उनके साथ थे। वे अक्सर भाषण में गरीब-गुरबा जैसे शब्द प्रयोग करते रहे। इस शब्द के जरिए भी वे दलितों को ही संबोधित करते हैं।

मौजूदा राजनीतिक हालात में आरजेडी अपने पारंपरिक वोट बैंक के साथ सत्ता में नहीं आ सकती है। ऐसे में तेजस्वी किसी भी सूरत में अपने साथ वोटबैंक बढ़ाने की जुगत में जुटे हैं।

बिहार में मुस्लिम वोटर करीब 17 और यादव 13 फीसदी हैं। कुल मिलाकर यह 30 फीसदी होता है। अब के दौर में मुस्लिम वोटर पूरी तरह से लालू के साथ नहीं है। काफी मुस्लिम वोटर नीतीश के सेक्युलर छवि पर भी वोट डालते हैं। दूसरी तरफी असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी आईआईएम भी काफी कुछ वोट काट रही है। वहीं पप्पू यादव भी यादवों के वोट में सेंध मार रहे हैं। इसके अलावा बीजेपी की ओर से नित्यानंद राय और नंदकिशोर यादव जैसे चेहरे भी काफी वोट अपनी पार्टी को दिलवा रहे हैं। यादव को छोड़कर ओबीसी की अन्य जातियों में से कोइरी 6.4%, कुर्मी 4% भी आरजेडी को वोट नहीं करती है।

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बिहार में दलित और महादलित को मिलाकर करीब 16 फीसदी वोटर हैं। इसमें से करीब 5 फीसदी रामविलास पासवान की पार्टी के साथ होने का दावा किया जाता है। करी 5.5 फीसदी मुसहर जाति के वोटरों पर पकड़ होने का दावा करने वाले जीतन राम मांझी भी आरजेडी से दूर होने की कोशिश में हैं।

इसके अलावा महादलित कैटेगरी की जातियों को नीतीश सरकार ने जितनी तरह की मदद की है उससे उनका झुकाव उनकी पार्टी के प्रति हालिया चुनावों में दिख चुका है।

ऐसे में विपक्षी खेमा चाहता है कि अगर चिराग पासवान उनके साथ आते हैं तो पासवान के 5 फीसदी वोट एकमुश्त उनके पास आ सकते हैं। इसके आलावा चिराग के दलित फेस को देखते हुए भी कुछ वोट और भी आ सकते हैं।

एनडीए में क्यों असहज हैं चिराग

राम विलास पासवान राजनीति के मौसम वैज्ञानिक माने जाते हैं। जिस भी पार्टी की सरकार होती है वे उनके साथ ही जाते हैं। लेकिन इस बार उनके बेटे विरोध के सुर बुलंद किए हुए हैं। इसकी असली वजह एनडीए के भीतर की राजनीति है। इस बार एनडीए में इस बात पर जोर है कि बीजेपी को ज्यादा सीटें आएंगी या जेडीयू को। दोनों दल चाहती है कि उनके ज्यादा विधायक हों। दोनों दलों के आपसी कंपटीशन में एलजेपी समझ रही है कि उसकी दाल गलने में मुश्किल हो सकती है। चिराग पासवान इसलिए 42 सीटों की डिमांड कर रहे हैं। साथ ही सूत्र बताते हैं कि चिराग डिप्युटी सीएम की कुर्सी भी चाहते हैं। ऐसी स्थिति में ना बीजेपी, ना जेडीयू दोनों नहीं चाहेंगे कि राज्य की राजनीति में चिराग का कद बढ़े। हालांकि यह चिराग पासवान को ही तय करना है कि वह एनडीए में बने रहेंगे या विपक्षी दलों के साथ जाकर उनके खेमे को मजबूती देंगे।

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