बॉर्डर पर तनातनी बरकरार, पांचवीं बार मिल रहे भारत-चीन के मिलिट्री कमांडर


Edited By Deepak Verma | पीटीआई | Updated:

भारत-चीन के बीच बातचीत।
हाइलाइट्स

  • भारत और चीन के बीच सीमा पर अप्रैल में शुरू हुआ था तनाव
  • 5 मई को चरम पर पहुंच गया, गलवान में भिड़े थे दोनों देशों के सैनिक
  • उसके बाद से बातचीत के जरिए तनाव कम करने की कोशिशें जारी
  • गलवान, गोगरा और हॉट स्प्रिंग्‍स से पीछे हटी चीनी सेना मगर पैंगोंग और देपसांग में अड़ी
  • आज पांचवीं बार मिल रहे हैं भारत-चीन के कमांडर

नई दिल्‍ली

भारतीय और चीनी सेना के कमांडरों के बीच रविवार को पांचवें दौर की बातचीत चल रही है। पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पास टकराव वाले सभी स्थानों से सैनिकों के जल्द पीछे हटने पर चर्चा हुई। यह मीटिंग पर चीन की तरफ मोलदो में सुबह 11 बजे से शुरू हुई। सूत्रों ने बताया कि भारतीय पक्ष पैंगोंग त्‍सो के फिंगर इलाकों से चीनी सैनिकों को पूरी तरह से जल्‍दी हटाने पर जोर देगा। इसके अलावा टकराव वाले कुछ अन्य स्थानों से भी सैनिकों को हटाने की प्रक्रिया पूरी करने पर भी बात होगी। कोर कमांडर स्तर की पिछली वार्ता 14 जुलाई को हुई थी, जो करीब 15 घंटे तक चली थी।

पैंगोंग और देपसांग पर फोकस

रविवार की वार्ता में, भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व लेह स्थित 14 कोर के कमांडर, लेफ्टिनेंट जनरल हरिंदर सिंह कर रहे हैं। जबकि चीनी पक्ष का नेतृत्व दक्षिणी शिनजियांग सैन्य क्षेत्र के कमांडर, मेजर जनरल लियू लिन। बातचीत में मुख्य रूस से पैंगोंग त्‍सो और देपसांग जैसे टकराव वाले स्थानों से ‘‘समयबद्ध और प्रमाणित किये जाने योग्य” पीछे हटने की प्रक्रिया के लिए रूपरेखा को अंतिम रूप देना और एलएसी के पास बड़ी संख्या में मौजूद सैनिकों तथा पीछे के सैन्य अड्डों से हथियारों की वापसी पर दिया जाएगा।

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लद्दाख में सियाचिन जैसी तैयारी

चीन के साथ पूर्वी लद्दाख सेक्‍टर में तनाव को देखते हुए भारतीय सेना लंबे संघर्ष के लिए तैयार है। भारी संख्‍या में सैनिकों को पहले ही तैनात रखा गया है। उन सभी को हाई ऑल्‍टीट्यूड में यूज होने वाली किट्स मुहैया कराई जा रही हैं। इसके लिए विदेशी सप्‍लायर्स से भी बातचीत चल रही है। लद्दाख में तैनात जवानों को सियाचिन में तैनात जवानों जैसे अत्‍याधुनिक उपकरण दिए जाएंगे। गलवान के बाद सरकार ने LAC के पास किसी भी चीनी दुस्साहस का ‘‘करारा’’ जवाब देने की “पूरी छूट” दे रखी है। भारतीय वायु सेना और नौसेना भी हाई अलर्ट पर हैं।

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पहले की स्थिति से कम कुछ मंजूर नहीं

पिछली बातचीत में, भारतीय पक्ष ने चीनी सेना (पीपुल्स लिबरेशन आर्मी) को ‘बहुत स्पष्ट’ संदेश दिया था कि पूर्वी लद्दाख में पहले की स्थिति बरकरार रखी जाए। भारत ने कहा था कि चीन को इलाके में शांति बहाल करने के लिए सीमा प्रबंधन के संबंध में उन सभी प्रोटोकॉल का पालन करना होगा, जिनपर परस्पर सहमति बनी है। भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने चीन की पीएलए को उसकी सीमा (लक्ष्मण रेखा) से अवगत कराया था और कहा था कि क्षेत्र में पूरी स्थिति में सुधार लाने की जिम्मेदारी मुख्यत: चीन पर है। वार्ता के बाद, सेना ने कहा था कि दोनों पक्ष सैनिकों के “पूरी तरह से पीछे हटने” को लेकर प्रतिबद्ध हैं। साथ ही कहा था कि प्रक्रिया “जटिल” है और इसके “लगातार प्रमाणीकरण” की जरूरत होगी।

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चीन ने नहीं किया समझौते का पालन

सूत्रों ने कहा कि चीनी सेना गलवान घाटी और टकराव वाले कुछ अन्य स्थानों से पहले ही पीछे हट चुकी है, लेकिन भारत की मांग के अनुसार पैंगोंग त्‍सो में फिंगर इलाकों से सैनिकों को वापस बुलाने की प्रक्रिया अभी शुरू नहीं हुई है। भारत इस बात पर जोर देता आ रहा है कि चीन को फिंगर-4 और फिंगर-8 के बीच वाले इलाकों से अपने सैनिकों को वापस बुलाना चाहिए। दोनों पक्षों के बीच 24 जुलाई को, सीमा मुद्दे पर एक और चरण की कूटनीतिक बातचीत हुई थी। तब विदेश मंत्रालय ने कहा था कि दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हैं कि द्विपक्षीय संबंधों के समग्र विकास के लिए द्विपक्षीय समझौते एवं प्रोटोकॉल के तहत एलएसी के पास से सैनिकों का जल्द एवं पूरी तरह पीछे हटना जरूरी है।

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डोभाल के दखल पर शुरू हुआ था डिसएंगेजमेंट

सैनिकों के पीछे हटने की औपचारिक प्रक्रिया छह जुलाई को शुरू हुई थी। उससे एक दिन पहले, क्षेत्र में तनाव कम करने के तरीकों पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच लगभग दो घंटे फोन पर बातचीत हुई थी। दोनों देशों के बीच, कोर कमांडर स्तर की पहली चरण की वार्ता छह जून को हुई थी, जब दोनों पक्षों ने गलवान घाटी से शुरू करते हुए गतिरोध वाले सभी स्थानों से धीरे-धीरे पीछे हटने के समझौते को अंतिम रूप दिया था। हालांकि, 15 जून को गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद स्थिति बिगड़ गई थी, जिसमें 20 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे। चीनी पक्ष के सैनिक भी हताहत हुए थे लेकिन इस बारे में चीन द्वारा अब तक कोई ब्यौरा उपलब्ध नहीं कराया गया है।

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