जम्मू-कश्मीर के उप राज्यपाल पद पर मनोज सिन्हा की नियुक्ति से क्यों याद आने लगे 1985 के अर्जुन सिंह, जानें वजह

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Edited By Naveen Kumar Pandey | इकनॉमिक टाइम्स | Updated:

जम्मू-कश्मीर के नव-नियुक्त उप राज्यपाल मनोज सिन्हा (फाइल फोटो)जम्मू-कश्मीर के नव-नियुक्त उप राज्यपाल मनोज सिन्हा (फाइल फोटो)

प्रणब ढाल सामंता, नई दिल्ली

बीजेपी शीर्ष नेतृत्व के भरोसेमंद और पूर्व केंद्रीय मंत्री मनोज सिन्हा जम्मू-कश्मीर के उप राज्यपाल (Leiutenant Governor) बनाए गए हैं। इससे संकेत मिलता है कि केंद्र सरकार इस केंद्रशासित प्रदेश में चुनाव करवाने से पहले वहां के राजनीतिक दलों के साथ बिल्कुल दो-टूक लहजे में बातचीत कर उन्हें अपने इरादे से वाकिफ करवा देना चाहती है।

हालांकि, समस्या यह है कि परिसीमन (Delimitaion) करने, चुनाव (Election) करवाने और जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्ज प्रदान करने की प्रक्रिया में तारतम्य कैसे बिठाई जाए। सिन्हा की नियुक्ति ऐसे नाजुक मौके पर हुई है जब प्रदेश में राजनीतिक ताकतों की तुलना में कट्टरपंथी तत्व ताकतवर हैं। उससे भी बड़ी चुनौती यह है कि वहां कट्टरपंथी ताकतें प्रदेश में नवनियुक्त पंचायत प्रतिनिधियों को निशाने पर रखकर स्थानीय युवाओं को आतंकवाद की राह पर धकेलने में लगी हैं।

जम्मू-कश्मीर में सिन्हा की एंट्री कई मायनों में अर्जुन सिंह जैसी है जिन्हें 1985 में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से उठाकर पंजाब का गवर्नर बना दिया गया था ताकि वो राजीव-लोंगोवाला अकॉर्ड को जमीन पर उतार कर वहां सामान्य राजनीतिक परिस्थितियां पैदा कर सकें। हालांकि, अर्जुन सिंह इस काम में सफल नहीं हो सके क्योंकि उनकी नियुक्ति के एक महीने के अंदर लोंगोवाल की हत्या हो गई और राजीव-लोंगवाल अकॉर्ड की धज्जियां उड़ गईं। तब पंजाब में उग्रवाद की नई लहर चल पड़ी जो पहले से ज्यादा बर्बर और स्थानीय था। यह ध्यान रखना जरूरी है कि अप्रैल 1982 में एम चेन्ना रेड्डी से शुरू होकर अप्रैल 1986 में सिद्धार्थ शंकर रे तक की नियुक्ति तक, वहां छह राज्यपाल बदले। अर्जुन सिंह तो सिर्फ आठ महीने ही पंजाब के गवर्नर रह सके थे।

इसलिए, अगर इतिहास से सबके लें तो कह सकते हैं कि केंद्र सरकार को जम्मू-कश्मीर में भी उप राज्यपालों को बदलने की प्रक्रिया में बहुत सावधानी बरतने की जरूरत है। 1985 में उग्रवाद प्रभावित पंजाब में एक शांति समझौते को लागू करना था और अब जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 को निष्प्रभावी किए जाने और 35A को खत्म करने के बाद प्रदेश की राजनीति को नए सांचे में ढालना है। पिछले वर्ष जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक हैसियतत में बदलाव किया गया था। वहां नए कानून लिखे जा चुके हैं, दंड संहिताएं (Penal Codes) बदल चुकी हैं और स्थानीय आरक्षण कानून की खामियों को खत्म किया जा चुका है, साथ ही सरकारी नौकरियों में भर्तियों के पुराने नियमों को दरकिनार किया जा चुका है।

73वें और 74वें संशोधनों के लागू होने से घाटी में तीसरे स्तर का लोकतंत्र लागू होने जा रहा है। वहां फंडों और संसाधनों के वितरण की शक्ति सही हाथों तक पहुंचानी है। इसके लिए जम्मू-कश्मीर विधानसभा का चुनाव करवाना होगा। यही कारण है कि अब राजनीतिक बंदियों के धीरे-धीरे रिहा किया जा रहा है। नए उपराज्यपाल के रूप में सिन्हा की जिम्मेदारी है कि वो इस प्रक्रिया को तेज करें। केंद्र सरकार के लिए अच्छी बात यह है कि नैशनल कॉन्फ्रेंस जैसे राजनीतिक दलों के नेता जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा देने की ही मांग कर रहे हैं न कि विशेष राज्य के दर्जे की दोबारा बहाली की।

अगला सवाल डोमिसाइल सर्टिफिकेट का है। पश्चिमी पंजाब से आए शरणार्थियों और वाल्मीकि समुदाय के लोगों को नागरिकता प्रमाणपत्र (Domicile Certificats) देना अच्छा कदम होगा। निवर्तमान उप राज्यपाल जीसी मुर्मू कह चुके हैं कि इनकी आबादी 10-12 लाख से ज्यादा नहीं होगाी।

आखिरी सवाल परिसीमन का है। इसके लिए एक आयोग का गठन किया जा चुका है। अच्छा तो यह होगा कि परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही चुनाव करवाए जाएं। हालांकि, संभव यह भी है कि स्थानीय राजनीतिक दल खुद को इस प्रक्रिया से दूर रखें।

उप राज्यपाल मनोज सिन्हा की राजनीतिक बातचीत इन्हीं तीन मुद्दों के ईर्द-गिर्द के आसपास घूमती रहेगी। वो मध्यस्थों को कैसे अपनी बातें मनवा सकते हैं, यह उनकी सफलता का मूल आधार होगा। लेकिन, पंजाब में अर्जुन सिंह का छोटा कार्यकाल हमें बताता है कि कश्मीर जैसे संघर्ष के क्षेत्र में समय की पाबंदी का अलग दबाव रहता है क्योंकि हिंसा से अवसरों के दरवाजे बंद होने का खतरा रहता है।

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