जब रेप विक्टिम पर ही जा पड़े कानून की लाठी

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चलिए, शुरू अच्छी बात से ही करते हैं। अच्छी बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने अररिया गैंगरेप मामले में विक्टिम का साथ दे रहे उन दो युवा कार्यकर्ताओं को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया जिन्हें कोर्ट की कार्यवाही में बाधा डालने के आरोप में जेल भेज दिया गया था। इस मामले में विक्टिम पहले ही जमानत पा चुकी है, हालांकि एक हफ्ता जेल में गुजारने के बाद।

यह अच्छी बात सुनने के बाद मन में राहत पैदा होना स्वाभाविक है, लेकिन अगर यह राहत हमें ‘अंत भला तो सब भला’ कहते हुए मामले को समाप्त मान लेने की ओर ले जाती है तो इससे बुरी बात कोई हो नहीं सकती। इसका अहसास तब होता है जब हम इससे थोड़ा पहले की घटनाओं से गुजरते हैं। बिहार के अररिया जिले की रहने वाली 22 साल की यह लड़की 6 जुलाई की शाम को अपने एक परिचित के साथ बाइक चलाना सीखने गई थी। रास्ते में तीन अनजान लोग आए और वह परिचित युवक उस लड़की को उन्हें सौंपकर वहां से निकल गया। वे तीनों जबरन उसे एक सुनसान जगह ले गए। फोन करके एक और आदमी को बुलाया। फिर चारों ने उसके साथ रेप किया।

घर वालों से नाउम्मीदी का यह आलम था कि वह उनसे अपनी व्यथा कहने की भी हिम्मत नहीं कर पाई। सबसे पहले संपर्क किया कल्याणी से जो एक स्थानीय एनजीओ जेजेएसएस से जुड़ी हैं और तन्मय तथा चार-पांच अन्य कार्यकर्ताओं के साथ किराए के एक घर में रहती हैं। यह लड़की उस घर में मेड के तौर पर काम करती थी।

Countries with the most rape cases | India News - Times of Indiaकल्याणी और तन्मय ने उसे न केवल अपने घर में रखा बल्कि हर तरह से उसकी मदद में खड़े हुए। एफआईआर दर्ज होने के बाद 10 जुलाई को उसे मजिस्ट्रेट के सामने बयान दर्ज कराने बुलाया गया।

इस बीच लोकल मीडिया में उसकी पहचान जाहिर हो गई। गैंगरेप के चारों मुख्य आरोपी पुलिस की पकड़ से बाहर थे, पर विक्टिम का जो परिचित उसे उन लोगों तक ले गया था, वह एफआईआर के अगले दिन पकड़ लिया गया। उसके परिवार वाले विक्टिम से संपर्क करके उसे मनाने का प्रयास करने लगे कि परिचित उससे शादी कर लेगा, वह बस शिकायत वापस ले ले। अदालत में बयान दर्ज कराने से पहले उसे चार घंटे इंतजार करना पड़ा था और उस दौरान भी उस परिचित के घर वाले अदालत के कॉरिडोर में मौजूद थे। इन सबके बीच सामान्य प्रक्रिया के तहत अपने साथ हुई घटना का पूरा ब्योरा बार-बार देते हुए उसे ऐसे सवाल और कॉमेंट सुनने को मिल रहे थे, जिनसे लगता था कि इस घटना के लिए उसे दोषी माना जा रहा है।

विक्टिम की मनोदशा समझी जा सकती थी। कानून के मुताबिक बयान दर्ज करते समय विक्टिम के अलावा कोई और मौजूद नहीं रह सकता था, सो कल्याणी और तन्मय को बाहर रोक दिया गया। विक्टिम पढ़ी-लिखी नहीं है, सो उसने मौखिक तौर पर बयान दर्ज करवाया। लेकिन जब उससे लिखित बयान पर हस्ताक्षर करने को कहा गया तो वह अड़ गई। उसने कहा कि वह चाहती है, पहले यह बयान कल्याणी को पढ़ने दिया जाए। उनके कहने पर ही वह इस पर हस्ताक्षर करेगी। ऐसा कहते हुए उसकी आवाज ऊंची हो गई थी। आरोप है कि उसने वहां मौजूद लोगों से दुर्व्यवहार किया। मजिस्ट्रेट साहब ने उस लड़की और उसका समर्थन कर रहे दोनों कार्यकर्ताओं को अदालत की अवमानना करने और अदालती कार्यवाही में बाधा डालने का दोषी माना। आधे घंटे के अंदर तीनों गिरफ्तार हो चुके थे। फिर उन्हें 225 किलोमीटर दूर समस्तीपुर की एक जेल में भेज दिया गया।

सवाल है कि क्या यह सिर्फ एक घटना है, महज एक अपवाद। या आम तौर पर दिखने वाले व्यवहार की झलक देने वाली एक ऐसी घटना, जो कुछ वजहों से राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हो गई। इसका जवाब हमें और न्याय तंत्र से जुड़े हर व्यक्ति को तलाशना है, क्योंकि इस जवाब पर ही आगे के हमारे प्रयासों की दिशा निर्भर करती है।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं



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