अर्थव्यवस्था में जान फूंकते हैं प्रवासी लेकिन राज्यों में कोटा सिस्टम के बढ़ते चलन से बाहरियों के लिए घट रहीं नौकरियां

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हाइलाइट्स:

  • देश के विभिन्न राज्यों में प्राइवेट नौकरियों को स्थानीय निवासियों के लिए आरक्षित करने की होड़
  • 2019 में महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, हरियाणा और मध्य प्रदेश ने लोकल्स के लिए लाई आरक्षण व्यवस्था
  • बड़ा सवाल कि क्या राज्य सरकारों को ऐसा करने का अधिकार भारतीय संविधान देता है?
  • एक व्यावहारिक सवाल कि क्या विभिन्न आरक्षण नीतियों को जमीन पर उतार पाना आसान है?

नई दिल्ली
कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए लॉकडाउन के ऐलान के बाद अपने-अपने घरों का रुख करने वाले प्रवासी मजदूरों को वापस लाने की जद्दोजहद की जा रही है। उनके बिना फैक्ट्रियां पूरी क्षमता से उत्पादन नहीं कर पा रही हैं जिससे अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। दिलचस्प बात यह है कि कोरोना काल से पहले जिन राज्यों ने प्रवासियों को बोझ मानते हुए नौकरियों में स्थानीय नागरिकों के लिए आरक्षण का कानून लाया था या इस पर विचार कर रहे थे, आज वो इन्हीं प्रवासियों की वापसी का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। इनकी बेताबी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि फऐक्ट्री मालिक मजदूरों को कारों, बसों, ट्रेनों और यहां तक कि हवाई जहाजों से आने का ऑफर दे रहे हैं और ला भी रहे हैं।

राज्यों में आरक्षण का बढ़ता चलन

अब 2019 के आंकड़ों पर गौर करें तो कम-से-कम पांच राज्यों- महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, हरियाणा और मध्य प्रदेश – ने अपने यहां सरकारी नौकरियों के साथ-साथ निजी औद्योगिक संस्थानों में भी स्थानीय लोगों के लिए आरक्षण का कानून ला दिया है। उधर, गोवा और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्य स्थानीय लोगों की भर्ती करने पर उद्योगों को इन्सेंटिव दे रहे हैं।

लिस्ट में नया नाम हरियाणा का

प्रवासियों को रोकने और स्थानीय लोगों के लिए जॉब सुरक्षित करने की दिशा में कदम बढ़ाने वाला नया राज्य हरियाण है। उप-मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला ने शुक्रवार को कहा कि सरकार प्राइवेट संस्थानों की 75% नौकरियां राज्य के युवाओं के लिए आरक्षित करने जा रही है जिसके लिए विधानसभा में एक विधेयक पेश किया जाएगा। चौटाला ने 2019 के विधानसभा चुनाव अभियान के दौरान ही राज्यवासियों से यह वादा किया था और पिछले महीने राज्य कैबिनेट ने इस संबंध में एक अध्यादेश को मंजूरी दी थी।

मध्य प्रदेश में डॉमिसाइल पॉलिसी

इसी हफ्ते मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि राज्य की सरकारी नौकरियों पर सिर्फ मध्य प्रदेश के बच्चों का ही हक होगा। दरअसल, वहां 27 विधानसभा सीटों पर उप चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में कोई भी राजनीतिक दल चौहान के इस बयान का विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा सकी। वैसे भी चौहान के घोर प्रतिद्वंद्वी और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ भी राज्य की प्राइवेट नौकरियों में स्थानीय लोगों के लिए 70% रिजर्वेशन की बात कह चुके थे। इसलिए, कमलनाथ ने कहा, ‘आखिरकार आप (चौहान) युवाओं के रोजगार के मुद्दे पर 15 साल बाद जागे हैं।’

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महाराष्ट्र में 80% आरक्षण पर विचार
महाराष्ट्र देशभर से आए सबसे ज्यादा प्रवासी मजदूरों को रोजगार देता है। वहां शिवसेना के नेतृत्व में बनी महाविकास अघाड़ी सरकार निजी क्षेत्र की 80% नौकरियां राज्यवासियों के लिए आरक्षित करने का कानून लाने की योजना बना रही है। कम-से-कम 15 वर्षों से महाराष्ट्र में रह रहे लोगों को नौकरी दिए जाने की दृष्टि से कानून राज्य का निवासी माना जाएगा।

कर्नाटक, आंध्र प्रदेश में भी आरक्षण नीति

दिसंबर, 2019 में कर्नाटक सरकार ने कर्नाटक इंडस्ट्रियल एंप्लॉयमेंट (स्टैंडिंग ऑर्डर्स) रूल्स, 1961 में सुधार कर प्राइवेट नौकरियों में स्थानीय लोगों को प्राथमिकता दिए जाने को अनिवार्य कर दिया। कानून कहता है कि जो लोग कर्नाटक में कम-से-कम 15 साल से नहीं रह रहे हैं और जो कन्नड़ पढ़ना, लिखना और बोलना नहीं जानते हैं, वो औद्योगिक संस्थानों में क्लर्क और शॉप-फ्लोर जॉब्स के योग्य नहीं होंगे। हालांकि, कितना प्रतिशत आरक्षण होगा, इसका ऐलान अभी तक नहीं किया गया है। पिछले साल आंध्र प्रदेश ने सरकारी और निजी, दोनों क्षेत्रों की नौकरियों में 75% रिजर्वेशन का ऐलान कर दिया। हालांकि, कानून को अभी लागू नहीं किया गया है।

स्थानीयों के लिए आरक्षण की व्यवस्था संवैधानिक है?

राज्य सरकारें जो कर रही हैं, क्या उन्हें इसका संवैधानिक अधिकार है? इस सवाल पर लोकसभा के पूर्व महासचिव और संविधान विशेषज्ञ पीडीटी आचार्य कहते हैं, ‘संविधान के अनुच्छेद 16 में एक प्रावधान है जिसके तहत निवास स्थान के आधार पर आरक्षण का अधिकार दिया गया है। राज्य इस प्रावधान के तहत आरक्षण का कानून ला सकते हैं, लेकिन आरक्षण का मकसद उन वर्गों या समूहों को मुख्य धारा में लाने का होना चाहिए जिन्हें उचित प्रतिनिधत्व नहीं मिला है। कोई भी राज्य सभी नौकरियों को आरक्षित नहीं कर सकती है। ऐसा करना संविधान की भावना का उल्लंघन होगा जो नागरिकों को अन्य अधिकारों के साथ-साथ कहीं भी आने-जाने, बसने और आजीविका का साधन अपनाने का अधिकार देता है। सबसे बड़ी बात है कि इस तरह के आरक्षण से राष्ट्रीयता की भावना को आघात पहुंचता है।’

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आसान नहीं आरक्षण नीति को जमीन पर उतार पाना
खैर, कानून को लेकर उठ रहे सवालों को दरकिनार भी कर दें तो भी राज्यों के अपना मंसूबा पूरा करना बहुत आसान नहीं होने वाला। मसलन, गुजरात ने 1995 से ही एक नीति लाई थी जिसमें कहा गया है कि सरकारी लाभ प्राप्त करने वाले सरकारी और निजी, दोनों तरह के औद्योगिक संस्थानों में स्थानीय लोगों के लिए 85% नौकिरयां आरक्षित रहेंगी। लेकिन यह पॉलिसी अब तक कागजों तक ही सीमट कर रह गई है। निजी क्या, सरकारी उपक्रम भी इस नीति का पालन नहीं करते। गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने कई मौकों पर यह नीति को जमीन पर लागू करने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें उद्योगपतियों के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा।

संविधान के अनुच्छेद 16 में एक प्रावधान है जिसके तहत निवास स्थान के आधार पर आरक्षण का अधिकार दिया गया है। राज्य इस प्रावधान के तहत आरक्षण का कानून ला सकते हैं, लेकिन आरक्षण का मकसद उन वर्गों या समूहों को मुख्य धारा में लाने का होना चाहिए जिन्हें उचित प्रतिनिधत्व नहीं मिला है।

PDT आचार्य, संविधान विशेषज्ञ

इसमें कोई शक नहीं कि जो राज्य बहुत हद तक प्रवासी मजदूरों पर निर्भर हैं, उनके लिए आरक्षण कानून लागू करना बहुत कठिन होगा। हरियाणा देश के टॉप मैन्युफैक्चरिंग हब में शुमार है। ऐसे में उसे बड़ी संख्या में तकनीकी कौशल युक्त मजदूरों की जरूरत है। इसलिए, वहां के उद्योगपतियों ने गुजरात की तरह ही कोटा सिस्टम का कड़ा विरोध किया।

तमिलनाडु का उदाहरण

उधर, तमिलनाडु भी देश का एक बड़ा ऑटोमोबाइल हब है जहां अब तक कोटा सिस्टम की बात भी नहीं उठी है। उसने राज्य के निवासियों को तकनीकी कौशल देने पर जोर लगाया है। इस कारण वहां इस क्षेत्र की नौकरियों पर स्वाभाविक चयन तमिलों की ही होती है।

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